लाल साड़ी का अभिशाप: लोहड़ी की वह खौफनाक रात

आर्यन, जो शहर की चकाचौंध से दूर अपनी दादी के घर गांव आया था, उसे शोर-शराबा बिल्कुल पसंद नहीं था। शांति की तलाश में वह भीड़भाड़ से दूर, एक पुरानी हवेली के पीछे वाले मैदान में जाकर बैठ गया। वहां गांव की अब तक की सबसे बड़ी लोहड़ी जलाई गई थी।रात के करीब 2 बज रहे थे। दूर कहीं से ढोल की हल्की-हल्की आवाजें सुनाई दे रही थीं, लेकिन उस मैदान में अब सिर्फ सन्नाटा पसरा था। लोहड़ी की विशाल आग अब केवल दहकती हुई राख (अंगारों) में तब्दील हो चुकी थी।आर्यन वहां पड़ी एक पुरानी कुर्सी पर बैठकर अपने फोन में व्यस्त था।

कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। अचानक, हवा का एक तेज और बर्फीला झोंका आया और आग की बची-कुची चिंगारियां भी बुझ। पूरे मैदान में अब गहरा अंधेरा छा चुका था। आर्यन ने तुरंत अपने फोन की फ्लैशलाइट जलाई और वहां से उठने ही वाला था कि तभी उसे एक आवाज सुनाई दी— “छन-छन… छन-छन…”आर्यन चौंक गया— “पायल की आवाज? वह भी इस वक्त?” उसने रोशनी चारों तरफ घुमाई, लेकिन कोई नजर नहीं आया। उसे लगा शायद कोई भटकती हुई भेड़ होगी जिसकी घंटी बजी हो। लेकिन जैसे ही उसने मैदान से बाहर निकलने का रास्ता पकड़ा, उसे बुझती हुई आग के दूसरी तरफ धुंध में कुछ लाल रंग का दिखाई दिया। कोहरे के कारण वह साफ नहीं था।

जैसे ही आर्यन ने फ्लैशलाइट की रोशनी उस तरफ की, उसके पैर जड़ हो गए। वहां कोई लड़का नहीं, बल्कि एक लड़की बैठी थी। उसने गहरे लाल रंग की भारी साड़ी पहनी थी। उसका चेहरा घूंघट से ढका हुआ था, बस उसके हाथ दिखाई दे रहे थे—जो बिल्कुल सफेद थे, जैसे उनमें खून का एक कतरा भी न हो।आर्यन ने कांपती आवाज में पूछा, “आप… आप कौन हैं? सब तो चले गए हैं। फिर आप यहां कैसे?”लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस बुझी हुई राख को एकटक देखे जा रही थी। आर्यन को लगा शायद उसे ठंड लग रही है। वह उसके करीब गया और बोला, “आग बुझ चुकी है और ठंड बहुत है, आपको घर जाना चाहिए।”

जैसे ही उस लड़की ने अपना सिर उठाया और घूंघट थोड़ा पीछे सरका, आर्यन की चीख निकल गई। उसकी आंखें पूरी तरह काली थीं—उनमें सफेद हिस्सा था ही नहीं। उसने अपना मुंह खोला और एक ऐसी आवाज निकाली जो इंसानी नहीं लग रही थी:“लोहड़ी… मेरी लोहड़ी अधूरी रह गई…”आर्यन घबराकर हकलाते हुए बोला, “क्या मतलब? लोहड़ी का त्योहार तो खत्म हो गया।”तभी वह लड़की जोर-जोर से हंसने लगी। आर्यन पीछे हटने लगा, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन में धंस गए थे। उसने देखा कि उसकी लाल साड़ी के नीचे से खून टपक रहा था, जो धीरे-धीरे जमीन पर बहने लगा। वह अपनी भयानक आवाज में बोली, “मूंगफली और रेवड़ी से मेरा पेट नहीं भरता…”

इतना बोलते ही वह कुर्सी से खड़ी हो गई और उसका शरीर असामान्य रूप से लंबा होने लगा। वह चिल्लाई, “मुझे आग चाहिए… मेरी अपनी आग!”पुरानी याद और खौफनाक घेरातभी आर्यन को अपनी दादी की सुनाई वह कहानी याद आई—20 साल पहले रामपुर में एक नई दुल्हन आई थी। लोहड़ी की ही रात थी जब दहेज के लालची ससुराल वालों ने उसे उसी लोहड़ी की आग में जिंदा जला दिया था। वह दुल्हन अपने लाल शादी के जोड़े में ही राख हो गई थी। गांव वाले कहते थे कि जब भी लोहड़ी की आग ठंडी पड़ती है, वह अपनी आग तलाशने आती है।आर्यन ने वहां से भागने की कोशिश की, लेकिन रास्ता जैसे खत्म ही नहीं हो रहा था। वह जितना दौड़ता, घूम-फिर कर उसी बुझी हुई आग के पास पहुंच जाता।
लाल साड़ी वाली वह रूह अब उसके बिल्कुल पीछे थी।“एक गया… अब दूसरे की बारी… राख में मिल जाए दुनिया सारी…” उसके शब्दों में चीखें और सिसकियां मिली हुई थीं।अचानक मैदान के चारों ओर से और भी लोग निकलने लगे। वे गांव वाले नहीं थे—उनके शरीर जले हुए थे और कपड़े राख से सने थे। वे सब आर्यन को घेरने लगे। तभी उस लाल साड़ी वाली लड़की ने आर्यन का हाथ पकड़ लिया। उसका हाथ बर्फ से भी ज्यादा ठंडा था, लेकिन जहां उसने पकड़ा, वहां आर्यन की खाल जलने लगी।“तुम शहर से आए हो ना? तुम्हारे अंदर की गर्मी मुझे चाहिए,” उसने अपना घूंघट पूरी तरह हटा दिया। उसका आधा चेहरा जला हुआ था और आधा एक सुंदर दुल्हन जैसा।

उसने आर्यन को आग की राख के ढेर की तरफ खींचना शुरू किया। अचानक, वह राख नीली लौ के साथ जल उठी। यह आग ठंडी थी, लेकिन आर्यन का दम घुटने लगा।तभी आर्यन ने अपनी पूरी ताकत लगाई और जेब से एक पुरानी माचिस निकाली, जो उसने दादी के घर से उठाई थी। उसे याद आया कि दादी कहती थीं कि बुरी आत्माएं “पवित्र अग्नि” से डरती हैं। आर्यन ने एक तीली जलाई और उसे उस लड़की की लाल साड़ी पर फेंक दिया।एक भयानक चीख गूंजी और वह लड़की धुएं में बदल गई। मैदान में एक बवंडर उठा और सब कुछ गायब हो गया। आर्यन बेहोश होकर गिर पड़ा।अगली सुबह जब उसकी आंख खुली, तो सूरज निकल चुका था। गांव वाले वहां जमा थे। आर्यन उसी कुर्सी पर बैठा था।
उसने सोचा शायद यह सब एक सपना था, लेकिन जैसे ही वह खड़ा हुआ, उसने अपने हाथ पर जली हुई उंगलियों के निशान देखे—ठीक वहीं जहां उस रूह ने उसे पकड़ा था।राख के बीच में लाल साड़ी का एक टुकड़ा पड़ा था, जो अब भी धीरे-धीरे सुलग रहा था। उसने गांव के एक बुजुर्ग से पूछा, “क्या यहां कोई हादसा हुआ था?”बुजुर्ग ने सहमी हुई नजरों से उसे देखा और कहा, “बेटा, हर साल हम लोहड़ी जलाते हैं ताकि वह आग के नीचे दबी रहे। जिस दिन यह आग पूरी तरह ठंडी पड़ गई, वह बाहर आ जाएगी। तुम खुशकिस्मत हो कि आज का सूरज देख पा रहे हो।”आर्यन वहां से भागते हुए अपने हाथ को देख रहा था। वहां अब भी लाल साड़ी की एक अजीब सी गंध आ रही थी… और दूर खेतों से किसी के गाने की आवाज आई:“तेरा कौन विचारा… हो!”आर्यन समझ गया था… वह फिर आएगी। अगली लोहड़ी पर।
Conclusion
आर्यन की उस खौफनाक रात ने यह साबित कर दिया कि कुछ जख्म वक्त के साथ भी नहीं भरते। वह लाल साड़ी वाली दुल्हन आज भी अपनी अधूरी लोहड़ी और उस आग की तलाश में है, जिसने कभी उसकी दुनिया उजाड़ दी थी।
आर्यन के हाथ पर बना वह जलने का निशान इस बात का गवाह है कि वह कोई सपना नहीं, बल्कि एक रूह की हकीकत थी। गांव वालों के लिए लोहड़ी अब सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि उस रूह को कैद रखने का एक जरिया है। लेकिन सवाल वही रहता है—क्या इंसान की जलाई हुई आग, उस नफरत और प्रतिशोध की आग को शांत कर पाएगी? जब तक इंसाफ की लौ नहीं जलती, वह हर साल राख के ठंडे होने का इंतज़ार करती रहेगी।
