वो आखिरी डेलिवरी: एक खौफनाक हकीकत

आज से ठीक दो साल पहले, मैं दिल्ली के एक बाहरी इलाके के डोमिनोज आउटलेट में पिज्जा डिलीवरी बॉय का काम करता था। वो नौकरी थका देने वाली थी, लेकिन उस रात जो हुआ उसने मेरी रूह तक कँपा दी। रात के 11:15 बज रहे थे। बाहर मूसलाधार बारिश अभी थमी ही थी, और सड़कों पर सन्नाटा पसर चुका था। मेरा शिफ्ट खत्म होने वाला था, और मैं बस अपनी बाइक की चाबी उठाने ही वाला था कि तभी काउंटर का फोन घनघना उठा।अमूमन रात के इस वक्त ऑर्डर लेने वाला लड़का जा चुका होता था, पर उस रात स्टोर मैनेजर ‘खन्ना जी’ अपने केबिन में कुछ हिसाब कर रहे थे। उन्होंने वहीं से चिल्लाकर कहा, “अरे ओ समीर! जरा फोन उठा, देख किसका है।” मेरा मन गालियों से भर गया था, पर नौकरी का सवाल था। मैंने भारी मन से रिसीवर उठाया।

“हेलो, डोमिनोज पिज्जा…” मैंने बिना किसी उत्साह के कहा।दूसरी तरफ से कोई जवाब नहीं आया। बस एक अजीब सी ‘स्टैटिक’ आवाज थी, जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो। फिर एक लड़की की आवाज आई। वो आवाज इतनी धीमी और ठंडी थी कि मेरे कान के पास रोंगटे खड़े हो गए।”एक लार्ज मार्गेरिटा… एक्स्ट्रा चीज…”उसने अपना एड्रेस बताया—’बंजारा हिल्स, ओल्ड बंगला नंबर 31’। इससे पहले कि मैं उसका नाम पूछता या पेमेंट का तरीका पूछता, फोन कट गया। खन्ना जी ने कहा, “जल्दी निकल, आखिरी है, फिर घर जा।” मुझे क्या पता था कि ये मेरी जिंदगी की सबसे लंबी रात होने वाली है।

वो रास्ता शहर के मुख्य हिस्से से बिल्कुल अलग था। जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ा, पक्की सड़क खत्म हो गई और पथरीला, कच्चा रास्ता शुरू हो गया। दोनों तरफ पुराने बरगद और पीपल के पेड़ थे, जिनकी टहनियाँ हवा में ऐसे हिल रही थीं जैसे कोई काला साया हाथ हिला रहा हो। मेरी बाइक की हेडलाइट ही उस घने अंधेरे को चीरने वाली एकमात्र रोशनी थी।तभी, अचानक मेरी बाइक की लाइट एक छोटी सी आकृति पर पड़ी। रास्ते के बीचों-बीच एक बच्चा खड़ा था। नीला हाफ-पैंट और सफेद शर्ट, जो पूरी तरह गंदी थी। रात के 12 बजने वाले थे और इस सुनसान जंगल जैसे रास्ते पर बच्चा? मैंने तुरंत ब्रेक मारे। टायर रगड़ने की आवाज सन्नाटे में गूंज उठी।

“बेटा? यहाँ क्या कर रहे हो?” मैंने पूछा। मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।बच्चा हिल नहीं रहा था। उसका चेहरा नीचे की ओर झुका था। मैंने फिर हिम्मत जुटाई, “बेटा, रास्ता भटक गए हो क्या? घर कहाँ है तुम्हारा? चाहो तो मैं छोड़ देता हूँ।”उसने धीरे से अपना सिर उठाया। उसकी आँखें… वे बिल्कुल खाली थीं। कोई चमक नहीं, कोई डर नहीं। उसने कोई जवाब नहीं दिया, बस एक दिशा में इशारा किया। मैंने सोचा शायद वो डर के मारे बोल नहीं पा रहा है। पर जैसे ही मैं बाइक से उतरने लगा, वो बच्चा पलक झपकते ही पेड़ों के झुरमुट में गायब हो गया। मैं सन्न रह गया। मुझे लगा शायद मेरी आंखों का धोखा है।

तकरीबन 15 मिनट की और ड्राइविंग के बाद, मैं उस पते पर पहुँचा। वो एक विशाल, पुराना बंगला था जिसकी दीवारें काली पड़ चुकी थीं। गेट जंग खाया हुआ था और आधा खुला था। पूरे घर में एक भी लाइट नहीं जल रही थी। अजीब बात थी—पिज्जा ऑर्डर करने वाला परिवार जाग रहा होता है, पर यहाँ कब्रिस्तान जैसी खामोशी थी।मैंने गेट के अंदर कदम रखा। हर कदम के साथ सूखी पत्तियों के टूटने की आवाज आ रही थी। जैसे ही मैं दरवाजे के पास पहुँचा, मेरी नजर ऊपर वाले फ्लोर की खिड़की पर पड़ी। अचानक, वहाँ एक पीली लाइट जली।”चलो, कोई तो है,” मैंने खुद को तसल्ली दी।मैंने डोरबेल बजाई। कोई जवाब नहीं। फिर दूसरी बार… और तीसरी बार। अंदर से कोई आहट नहीं हुई।

मैं वापस मुड़ने ही वाला था कि तभी दरवाजा बहुत धीरे से ‘चर्ररर’ की आवाज के साथ खुला। अंधेरे गलियारे में वही बच्चा खड़ा था।मेरा खून जम गया। “तुम… तुम यहाँ? तुम तो रास्ते में थे, मुझसे पहले यहाँ कैसे पहुँच गए?”बच्चा बस मुझे देख रहा था। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। मैंने कांपते हाथों से पिज्जा बॉक्स आगे बढ़ाया। “ये… ये लो पिज्जा। ₹650 हुए।”उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया, पर पिज्जा लेने के लिए नहीं, बल्कि घर के अंदर इशारा करने के लिए। अंदर से एक सड़न भरी बदबू आ रही थी, जैसे कोई जानवर मर गया हो।”अंदर आ जाओ…” एक औरत की आवाज ऊपर से आई। वो आवाज ऐसी थी जैसे कोई गला दबाकर बोल रहा हो।मैंने कहा, “नहीं मैम, मैं अंदर नहीं आ सकता। आप बस पैसे दे दीजिए।”

तभी ऊपर के कमरे से एक ऐसी चीख गूंजी कि मेरे कान के पर्दे फटने लगे। वो चीख किसी दर्द में तड़पते इंसान की थी। “बचाओ! मुझे छोड़ दो!”मैं डर के मारे पीछे हटा। तभी ऊपर की खिड़की पर एक साया दिखा। एक औरत खड़ी थी, जिसके बाल बिखरे हुए थे और गला कटा हुआ था। उससे खून रिस रहा था और वो खिड़की के शीशे पर अपने खून से सने हाथ मार रही थी। नीचे खड़ा वो बच्चा अचानक मुस्कुराने लगा—उसकी मुस्कान इंसानी नहीं थी, उसका मुंह सामान्य से कहीं ज्यादा चौड़ा खुल गया था।मेरा पिज्जा बॉक्स हाथ से छूट गया। मैं अपनी बाइक की तरफ भागा जैसे पीछे मौत खड़ी हो। मैंने बाइक स्टार्ट की और उसे उसकी पूरी क्षमता पर भगाया।

पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं थी, पर मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि कोई साया मेरी बाइक के साथ-साथ हवा में उड़ रहा है।मैंने सीधा पुलिस स्टेशन जाकर दम लिया। मैं पसीने से नहाया हुआ था और कांप रहा था। इंस्पेक्टर ने मुझे पानी पिलाया और सारी बात सुनी।सुबह पुलिस की एक टीम के साथ मैं दोबारा उस बंगले पर गया। दिन की रोशनी में वो जगह और भी डरावनी लग रही थी। पुलिस ने जब अंदर जाकर तलाशी ली, तो उन्हें वहाँ धूल और मकड़ी के जालों के अलावा कुछ नहीं मिला। घर का सारा सामान 2 साल पुरानी अखबारों से ढका हुआ था।इंस्पेक्टर ने मेरे पास आकर जो कहा, उसने मेरी दुनिया हिला दी।
“बेटा, तुम जिस घर की बात कर रहे हो,वहाँ 2 साल पहले एक कत्ल हुआ था। एक सनकी आदमी ने अपनी पत्नी का गला रेत दिया था और अपने 10 साल के बेटे को सीढ़ियों से धक्का देकर मार दिया था। उनकी लाशें इसी घर में तीन दिन तक सड़ती रहीं। वो आदमी आज भी फरार है।””लेकिन सर… मैंने कल रात उस बच्चे को देखा! उस औरत की चीख सुनी!” मैं चिल्लाया।पुलिस वाले ने मुझे एक पुरानी फोटो दिखाई जो उसी घर से मिली थी। फोटो में वही बच्चा था—नीली पैंट और सफेद शर्ट में। वही बच्चा जो मुझे कल रास्ते में मिला था। और बगल में खड़ी उसकी माँ का चेहरा ठीक वैसा ही था जैसा मैंने खिड़की पर देखा था।मैं उस दिन के बाद फिर कभी डोमिनोज नहीं गया। आज भी जब कभी रात को फोन बजता है, मेरा दिल बैठने लगता है। मुझे डर है कि कहीं उस तरफ से वही ठंडी आवाज न आ जाए… “एक लार्ज मार्गेरिटा… एक्स्ट्रा चीज…”
Conclusion
उस रात ने समीर की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। पुलिस की बातों और उस पुरानी तस्वीर ने यह साफ कर दिया था कि उसने जो देखा, वो कोई इंसान नहीं बल्कि उन अधूरी रूहों की चीख थी जो आज भी उस खंडहरनुमा बंगले में कैद हैं। समीर ने नौकरी तो छोड़ दी, पर वह खौफ उसके साए की तरह साथ हो गया। आज भी, जब कभी अंधेरी रातों में बारिश होती है, उसे लगता है कि कोई बच्चा सड़क किनारे खड़ा उसका इंतजार कर रहा है। वह समझ चुका था कि कुछ ऑर्डर भूख मिटाने के लिए नहीं, बल्कि दुनिया को अपनी मौजूदगी का अहसास दिलाने के लिए दिए जाते हैं।
