दीवाली की आख़िरी रात Diwali especial

इतने दिनों से चल रही दिवाली की तैयारी, आखिरकार वही दिन आ गया जिस दिन सब दिवाली मनाने में खुश थे। धीरे-धीरे पूरा दिवाली का दिन निकल गया ,रात में खूब पटाखे फूटे,। अब रात के ग्यारह बज चुके थे। अब इस टाइम तक आते-आते पटाखों की भी आवाज़ कम होने लगी थी। पूरी गली रोशनी से जग-मग हो रखी थी, लेकिन शर्मा जी का घर पूरा अंधेरे से भरा हुआ था। बस घर के बीच में एक ही दिया जल रहा था, वह भी छोटा सा, और देखने में ऐसा लग रहा था कि पता नहीं कब बंद हो जाए।
रवि ने अपनी खिड़की से बाहर देखा और अपनी पत्नी सविता को बोला,

“बाहर सब के घरों में इतनी रोशनी है और हम लोग यहाँ पे अंधेरे में बैठे हैं। यह देख के मुझे अच्छा नहीं लग रहा है, सविता।” तभी तुरंत सविता बोली, “तुम्हें याद है ना? पंडित जी ने बोला था कि ज़्यादा घर में रोशनी नहीं होनी चाहिए। एक दिया जो जल रहा है, इतना ही बहुत है दिवाली के लिए, क्योंकि कहा जाता है कि दिवाली की रात कुछ आत्माएँ वापस लौटती हैं अपने घरों में और उन्हें ज़्यादा रोशनी देख के गुस्सा आता है।

रवि इतना सुनते ही हँसने लगा, “तेरा भी दिमाग चल गया है, कुछ भी बोलती रहती है।” तभी रवि ने टॉर्च उठाई और जलाने लगा पर वह जली ही नहीं और शाम से बिजली भी नहीं आ रही थी। बारह बज चुके थे, बाहर भी हर जगह शांति हो गई थी। रवि ने बोला, “चलो अब दिया बुझाओ और हम भी सोने चलते हैं।” सविता बोली, “बिल्कुल भी नहीं, यह दिया पूरी रात जलना चाहिए।” रवि की निगाह घड़ी की सुई पे गई तो उसने देखा घड़ी की सुई वहीं अटक गई।
तभी दिया टिमटिमाने लगा।

उस दिए की लौ से अब दो परछाईं दीवार पर दिख रही थीं— रवि और सविता की। तभी उन दोनों की परछाईं के बीच में एक और परछाईं। रवि वह देखते ही काँप गया। रवि ने डरते हुए सविता को बोला, “यह किसकी है दीवार पे?” सविता ने मुड़ के देखा तो कुछ भी नहीं था। दिया फिर से टिमटिमाने लगा पर अब उसकी लौ नीली हो चुकी थी। रवि बोला, “सविता, ये देख, इस दिए को क्या हुआ है?” सविता उस दिए को देखकर डर गई और बोली, “जब दिए की लौ नीली हो जाए तो समझो कोई आत्मा या कोई साया हमारे पास है।”

तभी गेट के बाहर से आवाज़ आई, जैसे कोई नाखून से खरोंच रहा हो अंदर आने के लिए। रवि बोला, “शायद कोई बिल्ली या कुत्ता होगा, डर मत।” जैसे ही खरोंचने की आवाज़ बंद हुई तभी ज़ोर-ज़ोर से गेट पे ठक-ठक होने लगी। तभी रवि गुस्से में हो कर ज़ोर से बोला, “कौन है गेट पे?” तभी बाहर से एक डरावनी आवाज़ आई, (“दिया बुझा दो!”)। सविता ने रवि से तभी घबराते हुए कहा, “बिल्कुल भी दिया मत बुझा देना।”

तभी रवि गेट की तरफ़ बढ़ा। उसने गेट की बीच की दरार में से देखा तो बाहर एक परछाईं थी जो बहुत लंबी-सी थी, जिसका सर तो रवि के गेट की तरफ़ था और पूरा शरीर रोड की तरफ़। उसके देखते ही रवि डर के मारे गेट से पीछे हट गया और बोला, “यह कौन खड़ा है बाहर?” सविता का पूरा शरीर काँप गया और बोली, “यह वही है जिसे सब लोग ‘अंधेरे की पूजा’ बोलते हैं। मैं तुम्हें इसलिए ही बोल रही थी कि अगर दिया बंद कर दो तो ऐसी चीज़ें आने लगती हैं।” अचानक कमरे का दरवाज़ा खुद-ब-खुद खुल गया और कमरे की सारी चीज़ें हिलने लगीं, जैसे वो चीज़ अब अंदर आ गई हो।

बस दिया जलता रहा और हिला नहीं, पर उन दोनों ने जब सामने देखा तो बस दो पैर घुटने तक दिख रहे थे, वो भी उल्टे। कुछ ही सेकंड में वो दोनों पैर भी गायब हो गए। सविता ने बोला, “रवि, कुछ भी हो जाए बस हमें दिए को बुझने नहीं देना है।” तभी उनके कमरे में से एक आवाज़ आई, (“लो, तुमने मुझे बुलाया था ना इसलिए मैं तुम लोगों के पास आ गई।”)। अब दिए के दूसरी तरफ़ एक कोई अजीब सा चेहरा दिखने लगा— उसके लंबे काले बाल, सफ़ेद आँखें और होंठ एकदम नीले

अब वो परछाईं मुस्कुराई और बोली, “हर दिवाली तो तुम लोग मुझे बुलाते नहीं हो पर इस बार तुम लोगों ने मुझे बुलाया, एक दिया जलाकर वो भी मेरे लिए।” सविता ने ज़ोर से चीख़ा और दोनों हाथों से अपना मुँह ढाँक लिया और बोली, “कुछ करो, हमें बचाओ।” रवि ने उसे मारने के लिएडरते-डरते एक लकड़ी उठाई और बोला, “तू कौन है?” (वो परछाईं हँसती हुई बोली, “मैं हूँ अँधेरे की देवी, जो रोशनी में नहीं बल्कि अँधेरे मेंआती हूँ और अब मैं आई हूँ तुम दोनों की आत्मा अपने साथ ले जाने।”

तभी दीवार हिलने लगी। सविता ने रवि का हाथ कसके पकड़ लिया और बोली रवि से कि हमें उसकी आँखों में नहीं देखना है। पर वो परछाईं एक झटके में उन दोनों के बिल्कुल करीब आ गई। इससे पहले वो दोनों कुछ कर पाते उस परछाईं ने उन दोनों की आत्मा को उन दोनों के शरीर से बाहरनिकाल लिया और उसी अंधेरे में ले के गायब हो गई और उन दोनों की लाश वहीं ज़मीन पे पड़ी रह गई।
Conclusion
यह कहानी बताती है कि दीवाली की रात को रोशनी के बाद होने वाले अंधेरे को भी हल्के में नहीं लेना चाहिए।
पंडित जी की चेतावनी को नज़रअंदाज़ करने और केवल एक दिया जलाने की वजह से, रवि और सविता ने अनजाने में ‘अँधेरे की देवी’ को अपने घर में बुला लिया था । उस भयानक परछाईं ने उनकी आत्माओं को कीच लिया, और उनकी लाशें उसी अँधेरे कमरे में पड़ी रह गईं, जिसे वे बुरी आत्माओं से बचाना चाहते थे।
यह कथा सिखाती है कि हर परंपरा के पीछे एक गहरा कारण छिपा होता है, और अंधेरे से जुड़ी कोई भी चीज को कभी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
