Aakhri Salaami: The Last Salute

हिमाचल की ऊंची पहाड़ियों पर स्थित एक जगह ‘काला-पत्थर’ थी, वहां का गेस्ट हाउस किसी पुराने किले की तरह दिख रहा था। बाहर बर्फ गिर रही थी और कोहरे के साथ एकदम ठंडी हवा चल रही थी। विक्रम सिंह बंगले के बड़े से बेडरूम में बैठा शराब का गिलास लिए फाइल देख रहा था, क्योंकि उसे अगली सुबह गणतंत्र दिवस के अवसर पर वहां तिरंगा फहराना था।विक्रम के लिए यह सिर्फ एक औपचारिकता थी। उसने हाल ही में एक बड़ा घोटाला किया था, जिसकी वजह से उसने बॉर्डर पर बनने वाली एक चेक-पोस्ट की क्वालिटी से समझौता किया था।

विक्रम के लिए ‘तिरंगा’ सिर्फ एक कपड़ा था और देशभक्ति सिर्फ एक दिखावा।अचानक, बंगले की लाइट झपझपाने लगी। टिक… टिक… टिक… विक्रम मन ही मन बड़बड़ाया, “लगता है वायरिंग पुरानी है।” तभी उसे छत पर किसी के चलने की आवाज़ आई। खत… खत… खत… वह भारी जूतों की आवाज़ थी। विक्रम चौंक गया। इस बंगले में उसके अलावा कोई नहीं था और उसका ड्राइवर भी उसे वहां छोड़कर जा चुका था।विक्रम ने टॉर्च उठाई और गलियारे में आया। हॉल के बीचों-बीच एक बड़ा सा लकड़ी का खंभा रखा हुआ था,

जिस पर कल सुबह फहराने के लिए तिरंगा पहले से ही बांध कर रखा गया था। लेकिन वहां पहुंचते ही विक्रम के पैर जम गए। बंगले के अंदर बिल्कुल हवा नहीं थी, सारी खिड़कियां बंद थीं, लेकिन वह तिरंगा ज़ोर-ज़ोर से लहरा रहा था। फड़-फड़-फड़! विक्रम ने टॉर्च की रोशनी झंडे पर डाली। उसने देखा कि झंडे के सफेद हिस्से पर कुछ गहरा रंग उभर रहा था। वह केसरिया नहीं था, न ही वह हरा था। वह ताज़ा खून था जो धीरे-धीरे अशोक चक्र की ओर बढ़ रहा था।”ये… ये क्या मज़ाक है?” विक्रम की आवाज़ कांपने लगी। उसने हिम्मत जुटाई और झंडे के पास गया।

जैसे ही उसने झंडे को छूना चाहा, पूरी बिल्डिंग एक धमाके के साथ कांप उठी। जो थोड़ी बहुत लाइट जल रही थी, वह भी बंद हो गई। अंधेरे में विक्रम को सिर्फ अपनी धड़कन सुनाई दे रही थी।तभी, कोने में रखे एक पुराने ग्रामोफोन से अचानक आवाज़ आने लगी— “जन गण मन…” लेकिन वह सुर किसी उत्सव के नहीं थे। वह आवाज़ ऐसी थी जैसे हज़ारों रूहें एक साथ रो रही हों। राष्ट्रगान की रफ्तार इतनी धीमी थी कि वह किसी मातम जैसी लग रही थी।विक्रम ने पीछे मुड़कर भागना चाहा, लेकिन दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

उसने देखा कि गलियारे की दीवारों पर पुराने ज़माने के सिपाहियों की परछाइयां दिख रही थीं। उनके हाथों में बंदूकें थीं और वे सब विक्रम की तरफ देख रहे थे। उनकी आंखों की जगह सिर्फ खाली अंधेरा था।”तुम कौन हो? मुझसे क्या चाहिए?” विक्रम चिल्ला पड़ा। तभी एक भारी और डरावनी आवाज़ गूंजी: “हमें सलामी चाहिए, विक्रम। उस मिट्टी की, जिसे तुमने चंद पैसों के लिए बेच दिया।”विक्रम ने देखा कि हॉल के बीच में लगा हुआ वह तिरंगा धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। उसका कपड़ा पूरे हॉल में फैलने लगा।

विक्रम भागकर कमरे में घुस गया और दरवाज़ा लॉक कर लिया। लेकिन झंडा दरवाज़े के नीचे से किसी तरल पदार्थ की तरह अंदर आने लगा।विक्रम खिड़की की तरफ भागा, लेकिन बाहर का नज़ारा देखकर उसकी सांसें रुक गईं। बाहर बर्फ पर हज़ारों शहीद सिपाही खड़े थे। उन सबके शरीर क्षत-विक्षत थे—किसी का हाथ नहीं था, किसी का सिर बंधा हुआ था, लेकिन सब के सब बस विक्रम को ही देख रहे थे।अचानक, विक्रम का अपना शरीर भारी होने लगा। उसे महसूस हुआ कि उसके पैर ज़मीन से जुड़ गए हैं।

उसने नीचे देखा तो उसके पैर पत्थर में बदल रहे थे। विक्रम गिड़गिड़ाया और बोला, “नहीं! मुझे माफ कर दो!”तभी उसके कान में वही आवाज़ आई: “देश के गद्दारों के लिए माफी नहीं, सिर्फ सज़ा होती है। तुम्हें इसी तिरंगे की रक्षा करनी थी, अब तुम हमेशा के लिए इसका हिस्सा बनोगे।”विक्रम की परछाई उसके शरीर से अलग होकर झंडे के पास जाकर खड़ी हो गई। उसका शरीर अब पूरी तरह ठंडा पड़ चुका था। उसका हाथ अपने आप उठा और माथे तक गया—एक आखिरी सलामी के लिए। जैसे ही उसने सलामी दी, वह वहां से गायब हो गया।

26 जनवरी की सुबह जब गांव के लोग और कुछ पुलिस वाले बंगले पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि दरवाज़ा खुला था। बाहर मैदान में ध्वजारोहण के लिए लोग इकट्ठे हुए। जब उन्होंने रस्सी खींची और तिरंगा फहराया, तो ऊपर से फूलों के साथ-साथ लाल रंग की धूल गिरी।लोगों ने देखा कि झंडे के पोल के ठीक नीचे एक पत्थर की बहुत ही सजीव दिखने वाली मूर्ति खड़ी है। वह मूर्ति विक्रम सिंह की थी। उसके चेहरे पर डर की ऐसी दहशत थी जो देखने वालों का कलेजा चीर दे। उसका एक हाथ सलामी की मुद्रा में था, लेकिन उसकी आंखों से पत्थर के आंसू निकल रहे थे।कहा जाता है कि आज भी हर 26 जनवरी की रात को उस बंगले से राष्ट्रगान की धुन सुनाई देती है, और वह पत्थर की मूर्ति थोड़ा सा हिलती है, जैसे कोई अपने गुनाहों का बोझ उठाए हमेशा के लिए कैद हो गया हो।
Conclusion
काला-पत्थर’ की यह घटना हमें याद दिलाती है कि देशभक्ति कोई ओढ़ने वाला लिबास या सिर्फ दिखाने की औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह एक पवित्र जिम्मेदारी है। विक्रम सिंह का अंत यह संदेश देता है कि जो व्यक्ति अपने निजी स्वार्थ और लालच के लिए देश की सुरक्षा और शहीदों के बलिदान के साथ गद्दारी करता है, उसे अंततः अपने ही जमीर और कर्मों की भयानक सज़ा भुगतनी पड़ती है। तिरंगा सिर्फ एक कपड़ा नहीं, करोड़ों भारतीयों की आत्मा और गौरव है, और इसका अपमान करने वाले को वक्त कभी माफ नहीं करता।
