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Dussehra Horror stories Scary Stories Series 34

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Dussehra Horror stories

 


जब दशहरे का मेला खत्म हो गया तो । विशाल और सुरज, दोनों, उस दशहरा के मेला मैं बहुत थक गए और धीरा धीरा घर वापस जा रहा थे । रावण का पुतला पूरी तारा  से जल चुका था | रात जाधा होगी थी इसलिए पूरी सड़क सुनसान होगी थी। सुनसान होना के मारे जब विशाल और सूरज चल रहे थे तो उनके पारो की सरसराहट हो रही थी अंधेरा इतना था कि पाड़ो की परछाई देखने से भी डर लग रहा था ,उस अँधेरा मैं देखना सा आसा लग रहा था कि जैसे वह कोई खड़ा हो ।“सूरज और विशाल दोनों हस्ते

हस्ते बात करते आ रहा थे जो वो दुशहरा मेला देख के आए थे उसके बारे मैं,है विशाल तुम कहा तो सही ही रहे हो पर चलो अब घर चलता  है क्यूँकि“रात भी बहुत होगी है और रोड भी ख़ाली है और अँधेरा मैं डर भी लगता है फिर दोनों ना अपना फ़ोन निकाल लिया मोबाइल कि फ़्लैश लाइट जलने के लिए उसकी लाइट की मदद से वो आगे चलते रहे चलते चलते उनकी सासे भी तेज तेज चल रही थी , और ख़ाली रास्ते मैं कदमों की भी आ रही थी ।उसी रास्ते मैं काफ़ी बड़े बड़े पड़े भी थे और काफ़ी झाड़िया  भी फली भी थी जिसे देखते ही एक डर सा महसूस हो रहा था | जब विशाल और सूरज चल रहे थे तो उन्हें एक डैम सा उल्लू की चिल्लाने

 

की एक दम आवाज आए जिसे ही उन दोनों ना वहाँ देखा उलु तो देखा न्ही  बल्कि उन पड़ो के अँधेरे के बीच कुछ लाल लाल सा कुछ चमक रहा था विशाल ने सूरज से बोला ये इस अँधेरे मैं क्या चमक रहा है ।सूरज ने कहा अरे आसा कुछ न्ही है बस यहाँ इतना अँधेरा है इसलिय लग रहा है सूरज ने विशाल बोला तो पर उससे भी डर लग रहता जब उन दोनों ने रूक के देखा उस अँधेरा मैं तो उन्हें आसा लग रहता की जो हमने कुछ लाल चमकता वा देखा था वह धीरा धीरा पास आता जा रहा था एक तो सड़क इतनी सुनसान ना कोई गड्डी और ना कोई इंसान उन दोनों को कुछ समज न्ही आया की क्या  करे विशाल और सूरज बिना कुछ

सोचा समजे तेज तेज भागने लगे पूरी रोड पे बस वही दोनों भाग रही थे हर जगह बस डर ही डर था क्यूकी एक तो अँधेरा उपर सा पड़े और झड़िया l पड़े की परछाईं रोड पे ऐसी लग रही थी जैसे वहाँ भी कोई खड़ा हो और कुछ ही देर मैं पता न्ही कहा सा कोरहा सा आना लगा जब एक दम से कोराह आया तो उससे डर और लगने लगा ,जब विशाल ने देखा की कोराह मैं कुछ न्ही दिख रहा तो विशाल ने फिर अपने फ़ोन की फ़्लैशलाइट को तेज करा आगे का रास्ता देखने के लिए लेकिन सब ठीक था जैसा उन दोनों को लग रहता आसा कुछ न्ही था

 

जब उन दोनों को आगे की सड़क नॉर्मल लगी तो उन्होंने फिर से आगे बढ़ना चालू किया l चलते चलते जैसे उनकी निगा सामने की तरफ़ गई तो उन्हें अब सामने बहुत दूर  दो लाल आखे चमकती वी दिखाई दे रही थी । सूरज ने कहा की विशाल ये लाल आखों वाला इंसान तो हो न्ही सकता की या भूत तो न्ही है । विशाल ने घबराते हुए फ़्लैशलाइट सामने की तरफ़ कर कि देखा लेकिन अब वो आखे दिख ही न्ही रही थी। पर उने या न्ही पता था हिस्सा वो आगे फ़्लैश लाइट से ढूंड रहे है वो उनके पीछा पीछा आ रहा है ।

अब वो दोनों इतने थक गए थे और डर गए थे की उनसे अब चला भी न्ही जा रहता , वो लाल आखे देखना के बाद उन दोनों के दिल मैं इतना डर बाठ गया था की उनकी दिल की अब धड़कने भी बढ़त गई । फिर उन दोनों को लगा कई वो भूत उनके पीछा तो न्ही है  क्योंकि जब फ़्लैशलाइट आगे मारी तो कुछ नहीं था पर उन्होंने जब पीछा भी देखा तो पीछा भी कुछ न्ही मिला पर अब उन दोनों के दिमाक मैं यह बात बेठ गई थी कि कोई तो था वहाँ पे अब उन्हें आसा लगने लगाता की ही चलते ही जा रहे है पर सड़क ख़त्म ही नहीं हो रही है । दुबारा पता पर पता नहीं कहा से फिर से कोहरा आने लगा था ।

जिस मोबाइल की लाइट की मदद से वो दोनों आगे बैड रहे थे अब वो भी लूप झुप करने लगी थीऔर साथ ही साथ एक तूफ़ान सा चलने लगा जिसमे पैड हिलने लगे और उनकी पत्तियाँ टूट टूट के गिर रही थी ।यह सब देख कि आसान तो पक्का लगने लगता की कोई तो हा हमारे आस पास , जब विशाल को कुछ समज नहीं आया की की करे जाए तो उसने विशाल का हात गोर से कस के पकड़ लिया ताकि वो दोनों एक साथ तेजी से भाग सके और उस रास्ते से निकल सके ।

उस लाल आखो की चमक इतनी थी कि उसका प्रकाश उन दोनों की आखो मैं महसूस हो रहता । पहला जो उनका मोबाइल फ़्लैश लूप झुप कर रहता अब वो पूरी रहा से बंद होगा था , जो थोड़ी बहुत रोशनी उन्हें मोबाइल की फ़्लैश से मिल रही थी अब वो भी न्ही थी उन दोनों के पास अब सिर्फ़ हर जगा अँधेरा और कुछ न्ही , अब पहले तो वो लाल आखे जो पता न्ही क्या चीज है और अब अँधेरा भी होगा था ।अब दोनों के पास एक ही चीज बची थी करने को और वो था फिर जान बचा कि भागना क्यूँकि वहाँ कोई ऐसी जगह न्ही थी की वो दोनों अपनी वहाँ रुकके जान बचा सके ।

दौड़ते दौड़ते आख़िरकार दोनों सड़क तक पोछने वाले ही थे उनके सामने फिर वही कोहरा आने लगा पर अब कोहरा तो था उसके सात राख भी उड़ने लगी उन दोनों को ये नहीं समज आ रहता आख़िर या सब कहा से आ रहे है । अब इतना वो समझते की या सब कहा से और कैसे हो रहा है इतने मैं उस राख मैं से ही एक परछाई धीरा धीरा आने लगी ।विशाल और सूरज ने जब यह चीज सच मूछ अपनी आखों से देखी तो वो डर के मारे पसीने पसीने होगए । क्यूँकि अब वो परछाई किसी पैड की तो थी न्ही और ना ही उन दोनों मैं से किसी की थी बल्की किसी दस सर वाली चीज की थी उस चीज के दस के दस चेहरे बहुत ही डरावने थे और जो

लाल आखे उन दोनों ने देखी थी वो इस ही डरावनी परछाई की थी । तभी विशाल ने सूरज से कहा सूरज तूने दिहान दिया यह परछाई उसी रावण की है जिसे हम अभी जलता वा देख के आए है । वो रावण की परछाई अब उनके सामने थी और रोड से थोड़ी सी ऊपर थी मतलब वो हवा मैं उड़ रही थी उसकी लाल आखो की चमक बहुत ही तेज थी इतनी लाल और बड़ी आँखे देख के सूरज और विशाल दोनों डर गए । उसका एक ही नहीं बल्कि जितने भी मू थे सारा के सारा बहुत ही डराने थे जैसे की हमारी अभी ही जान ले लेगे । सड़क पे हमारे लावा बस दो ही चीज दिख रही थी एक व्ही कोहरा जो पता न्ही कहीं से भी आजाता था और दूसरा वह जला वा रावण ।

तभी सूरज ने विशाल से कहा की जब वो रावण वहाँ जल गया था और हमने और सब लोगो देखा भी था उससे जलते वक्त तो फिर या यहाँ कैसे आ सकता है । अब दोनों बहुत ही जादा डरे वे तो थे ही फिर भी विशाल भी विशाल ने उसकी बाठ का जवाब दिया क्या पता वो हमसे कुछ चाहता हो यह हमने कुछ मेला मैं ग़लत किया हो तो हमे मारने आया हो । इतना बोलते ही वाह रावण जोर चिल्लाने लगा की हर जगह बस उसकी की आवाज ही सुनाई आ रही थी उसकी आवाज मैं इतना खोफ़ की बड़े बड़े पाड़ो की लकड़ियाँ टूटने लगी और तूफ़ान आने लगा ।

रावण इतना गुस्सा मैं होता जा रहा था की अब गुस्सा की मारे उसकी आख इतनी लाल होने लगी और उनका गुस्सा उन दोनों की आखों मैं साफ़ दिखाई दे रहा था । उन दोनों ने यह नजारा देख के फिर से भागना शुरू कर दिया पर अब आसा लग रहता की वो दोनों न्ही बचेगे उनके ना बचने की वजा थी की वो जहाँ भी भाग के अपने को बचने की कोशिश करते उनके वहाँ पोछने से पहले वही रावण आके खड़ा मिलता । अब रावण आगे कहीं न्ही दिख रहता तो उन्होंने सोचा की शायद हम बच गए तो उन्होंने रुक के सास ली जैसे ही उन्होंने सास लेना कि बाद पीछा की तरफ़ देखा तो वो रावण बुलबुल उनके पीछा ही था इतना वो दोनों भाग पाते या कुछ और कर करने को सोचते ।इतना मैं उस रावण उन दोनों को पकड़ा और अपना साथ उस कोहरा मैं ग़ायब होगा

 

CONCLUSION

जब विशाल और सूरज को अहसास हुआ उस लाल चीज का तो उनको लगने लगा था की वो ग़लत जगा आगे है । क्यूंकि जो लाल परछाई से वो डर रहे थे वो और कैसी की न्ही बल्कि रावण की थी जो बुरी तरह से उन दोनों की पीछे लग गई  थी । कुछ दिन भागने के बाद उन दोनों को लगा की वो बच गए है पर जैसे ही वो दोनों पीछा घुमा वो लाल आखो वाला रावण उन दोनों कि सामने ही था । विशाल और सूरज समज गए थे कि यह परछाई कोई साधारण नहीं है बल्कि वो एक  दशानन रावण है जिसका हर चेहरे पे अलग अलग तहर के दुख दर्द क्रोध दिख रहा था । उन दोनों को समज आगा था की रावण उन दोनों को ही लेना आया था जो वो सफ़ेद कोहरा था वो भी उसी की शक्ति का ही असर था आख़िर मैं वही हुआ जिसका उन दोनों को डर था वो रावण उन दोनों को उस धुन के साथ ही ले गया

कहानी का संदेश:

कभी-कभी, जब हम अपनी नासमझी या अहम के कारण किसी चीज़ का अपमान करते हैं, तो उसका प्रतिशोध हमारे लिए एक खतरनाक सजा बनकर आता है। जैसे रावण का प्रतिशोध अधूरा था, वैसा ही उनकी यात्रा भी अधूरी रह गई—कभी न खत्म होने वाला भय, डर और अंधकार उनके साथ हमेशा रहेगा।

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