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Peeche Woh Kon Hai Bhaiya Horror story New Scary Stories Series 17

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Peeche Woh Kon Hai Bhaiya Horror story

घना जंगल… काली रात… बादलों के पीछे छिपा चाँद।ठंडी हवा चल रही थी।एक पुरानी जीप सुनसान रोड पर धीरे-धीरे बढ़ रही थी।जीप की हेडलाइट से ही रास्ता दिख रही था ।जीप में दो लोग थे—अर्जुन और उसकी छोटी बहन **सिया**।सिया ने काँपते हुए पूछा,भैया… ये रास्ता ठीक है न?”अर्जुन ने हौसला देते हुए कहा , हा हा बस थोड़ी दूर और… हवेली वाला पुराना गाँव आ रहा है, वहीं रुकेंगे।”जीप आगे बढ़ती रही। हवा के झोंकों के बीच अजीब-सी खामोशी थी।गाँव पहुँचते ही सामने एक पुरानी, टूटी-फूटी हवेली खड़ी थी।काली दीवारें, हिलती खिड़कियाँ, और छत पर बँधी एक पीतल की घंटी… जो हवा में धीरे-धीरे बज रही थी।अर्जुन ने जीप रोकी और दरवाज़े की ओर बढ़ा।दरवाज़ा धक्का देने से चरमरा कर खुला गया अंदर गुप अँधेरा था।दीवारों पर जाले और नमी की गंध।कोने में पड़ी लालटेन जलाकर अर्जुन ने चारों ओर रोशनी डाली।

 

सिया ने डरते हुए पूछा,क्या यहाँ कोई रहता है?”अर्जुन बोला,नहीं… वीरान है।”तभी ऊपर मंज़िल से बच्चों के हँसने की आवाज़ आए खिलखिल… खिलखिल…सिया काँप उठी।भैया… आपने कुछ सुना?”अर्जुन ने नज़रें चुराकर कहा,कोई जानवर होगा… चलो, ऊपर चलते हैं।”सीढ़ियाँ चरमरा रही थीं।हर कदम पर लग रहा था जैसे कोई आत्मा जाग रही हो।दीवारों पर जले हुए हाथों के निशान थे।कमरे में टूटा पलंग, पुरानी अलमारी और बिखरे हुए बच्चों के खिलौने।सिया ने एक गुड़िया उठाई—उसके मुँह पर सूखा हुआ खून जैसा कुछ था।अर्जुन ने देखा तो उसका दिल दहल गया।तभी बाहर सीटी जैसी आवाज़ आई।खिड़की से देखा—हवेली के बाहर झूला अपने आप हिल रहा था।उस पर एक परछाई बैठी थी…

उलटी दिशा में,| अब उसझूले पर बैठी परछाई बिलकुल साफ़ दिख रही थी।बिखरे बाल, चेहरा ढँका हुआ… फिर उसने सिर घुमाया।उसका चेहरा… जैसे था ही नहीं।सिर्फ दो गहरे गड्ढे और काले होंठ।सिया डर के मारे चिल्लाई,भैया… वो कौन है?”अर्जुन ने काँपते हुए कहा,ये जगह… सही नहीं लग रही।”तभी अर्जुन बुदबुदाया,कहीं ये वही जगह तो नहीं… शकुन देवी की हवेली…”सिया ने पूछा,“कौन थी वो?”अर्जुन ने धीरे से बताया,“कहते हैं, उसकी बेटी के मरने के बाद वो पागल हो गई थी हर रात झूले पर बैठी उसे पुकारती रहती थी … और एक रात…”उसके बाद अर्जुन चुप होगा ।तभी दरवाज़े पर ज़ोर की ठक-ठक हुई।सिया डर गई,”क-कौन है?”अर्जुन ने लालटेन उठाई और नीचे गया।

दरवाज़ा हवा में झूल रहा था। बंद करने ही वाला था कि बाहर से हँसी की आवाज़ आई—खिलखिल…*अर्जुन ने दरवाज़ा बंद कर कुंडी लगा दी।पर बाहर से खरोंचने की आवाज़ आने लगी—तभी उसकी नज़र एक पुराने लकड़ी के दरवाज़े पर पड़ी—तहख़ाना।सिया बोली,नहीं… वहाँ मत जाओ…”पर अर्जुन ने दरवाज़ा खोल दिया।ठंडी हवा का झोंका ऊपर आया।अर्जुन लालटेन लेकर नीचे गया, सिया भी उसके पीछे-पीछे आ गई | जब वो नीचे पोछे उन्होंने देखा तहख़ाने में जाले, नमी और दीवार पर लिखा था—मुझे मेरी बच्ची दो…”अचानक अँधेरे से हँसी की आवाज़ आई।गुड़िया हाथ में लिए एक परछाई खड़ी थी।उसके मुँह से काले liquid जैसा कुछ टपक रहा था।सिया काँप गई।वो… वो क्या है भैया?”अर्जुन कुछ बोल पाता, उससे पहले दरवाज़ा बंद हो गया।लालटेन बुझ गई। अँधेरा छा गया।एक धीमी आवाज़ आई—

मुझे मेरी माँ चाहिए… तुमने देखा है मेरी माँ को?”अर्जुन बोला,“नहीं… हम बस चले जाना चाहते हैं…”परछाई हँसी—हा… हा… हा…*दीवारें काँपने लगीं।अर्जुन ने माचिस जलाई—परछाई ठीक सामने थी।उसकी आँखों से खून बह रहा था।वो चिल्लाया,“भागो सिया!”दोनों दरवाज़े की तरफ़ भागे।दरवाज़ा खुल गया जैसे ही वो सीढ़ियाँ  चाड के ऊपर पहुँचे।उन्होंने खिड़की से झाँका तो अब उस झूले के पास एक और परछाई खड़ी थी।एक औरत… गोद में वही गुड़िया लिए थी। और वो लोरी गा रही थी—लोरी सुन मेरी जान… सो जा री…”दोनों भागते हुए जीप तक पहुँचे पर जीप की बोनट पर वही गुड़िया रखी थी।सिया चीख पड़ी।अर्जुन ने गुड़िया फेंकी, जीप स्टार्ट की।जीप चल पड़ी।पीछे देखा—हवेली की छत पर वो औरत खड़ी थी, गोद में बच्ची थी।चाँद की तरफ़ देख रहे थे।

हवेली धीरे-धीरे धुँध में ग़ायब हो गई।सिया काँपते हुए बोली,भैया… ये सपना था… या सच?”अर्जुन ने बिना पीछे देखे कहा,पता नहीं… और मैं जानना भी नहीं चाहता।”पीछे से हसने की आवाज़ आई और जीप अँधेरे में गुम हो गई।और जीप अँधेरे में गुम हो गई।लेकिन कुछ दूर जाकर अर्जुन ने अचानक ब्रेक मारी।सिया घबरा गई,क्या हुआ भैया?”अर्जुन कुछ नहीं बोला… बस सामने की ओर इशारा किया।जीप की हेडलाइट में धुँध के बीच वही बच्ची खड़ी थी—गुड़िया हाथ में लिए, हँसती उसके पीछे एक साया उभरा… शकुन देवी का।उसकी आँखें अब अर्जुन को घूर रही थीं।अर्जुन ने काँपते हुए इंजन चालू किय लेकिन अब जीप स्टार्ट नहीं हो रही थी।सिया ने काँपती आवाज़ में पूछा,भैया… अब क्या होगा?”पीछे से आवाज़ आई—अब तुम कभी नहीं जाओगे…

Conclusion (निष्कर्ष):

अर्जुन और सिया ने एक वीरान हवेली को केवल रात बिताने की जगह समझा, लेकिन वो एक ऐसी आत्मा की गिरफ्त में आ गए जो अपनी बच्ची की मौत के बाद कभी चैन से नहीं सोई। शकुन देवी की आत्मा और उसकी बेटी की रूह उस हवेली में अब भी भटक रही हैं — इंतज़ार करती हुई, गुड़िया के ज़रिए उन अजनबियों को फँसाने के लिए जो वहाँ गलती से भी आ जाएँ।अर्जुन और सिया, जो सिर्फ एक सुरक्षित जगह की तलाश में थे, अब खुद उस रहस्य का हिस्सा बन चुके हैं। हवेली से निकलने के बाद भी वो भयावह छाया उनका पीछा नहीं छोड़ती।

अंत में, जब जीप रुक जाती है और आत्माएँ उनके सामने प्रकट होती हैं — ये साफ़ हो जाता है कि उनका लौटना अब संभव नहीं।शकुन देवी की हवेली कोई आम जगह नहीं… वो एक  फँसा देने वाला शापित संसार है, जहाँ जो भी जाता है — वो कभी लौट कर नहीं आता।अर्जुन और सिया का अंजाम अब एक राज़ है… जो उस हवेली की दीवारों में कैद हो गया है।और हर रात हवेली के बाहर वही झूला… अब फिर से धीरे-धीरे हिलता है… खिलखिल… खिलखिल…

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