THE HANGING TREE (फासी वाला पड़े )

हमारे गाँव में आज कुछ ज़्यादा ही अँधेरा हो रहा था। जिसके कारण गाँव में फैले बड़े जंगल में से छोटे-मोटे कीड़ों की आवाज़ गूँज रही थी। आज रात को शायद आसमान में घटा होने के कारण ज़्यादा ही अँधेरा लग रहा था। जब कभी ऐसा मौसम होता है तो हमारे गाँव के लोग जल्दी अपने कमरों में चले जाते हैं। लेकिन पता नहीं उस रात क्या हुआ, दो लड़के करीब बीस-बाईस साल के सोए ही नहीं थे और उन दोनों के नाम थे अरविंद और विजय। वे दोनों बचपन के दोस्त थे, वो बचपन के दोस्त जो बचपन से बड़े तक रोते-हँसते बड़े हुए थे।
लेकिन दोनों बिल्कुल अलग-अलग स्वभाव के थे। जैसे कि अरविंद का स्वभाव था हर चीज़ को मज़ाक में लेना, किसी भी पुरानी बातों पर विश्वास न करना। और विजय उससे बिल्कुल अलग था, डरपोक-सा, क्योंकि उसको लगता था कि जो पुराने लोग बातें बताया करते थे वे सब सच होती थीं। जैसे कि उस गाँव की सबसे पुरानी और डरावनी कहानी थी –फाँसी वाला पेड़’ जिसके पास कोई भी गाँव वाला नहीं जाता था।

‘फाँसी वाला पेड़’ कोई ऐसा-वैसा पेड़ नहीं है बल्कि वह एक विशाल पेड़ है जिसका तना बड़ा और मोटा है और बहुत सारी शाखाएँ हैं, जिसे सब गाँव वाले ‘फाँसी वाला पेड़’ बोलते थे। उस अँधेरी रात में अरविंद और विजय दोनों रात के समय घूम रहे थे, जैसे कि मौसम का आनंद ले रहे हों। विजय ने कहा, “भाई! तू ये उल्टी-सीधी बातों में क्यों लगा रहता है? एक बात सोच, अगर सच में भूत-प्रेत होते, तो तुझे लगता है कि वे हमें जीने देते? अब तक तो हम सबको मार भी दिया होता।” विजय ने उसे तुरंत डाँटकर बोला, “तू पागल है क्या? ऐसा मत बोल, क्योंकि ऐसी चीज़ों का मज़ाक नहीं बनाते हैं।
वो पेड़ कोई मज़ाक नहीं है, यह बात सच है कि जो कोई वहाँ गया है आज तक वापस नहीं आया है। इस बात को तू भी समझ ले, अच्छा होगा। यह बात मेरी दादीजी के साथ-साथ सब लोग बताते हैं।” अरविंद ने फिर उसका मज़ाक बनाया, बोला, “अच्छा चल ठीक है, अगर तुझे भी सच में ऐसा लगता है, तो ठीक है। तो फिर आज देख ही लेते हैं क्या उस पेड़ के नीचे सच में कुछ है भी या नहीं। चल एक शर्त लगाते हैं, तू मेरा साथ चल उस पेड़ के नीचे, जो उस पेड़ के नीचे ज़्यादा देर टिक पाया वही असली मर्द होगा, और तेरा अंदर से बेकार का वहम भी निकल जाएगा।

अब बता, चलेगा या फिर डर गया?” अब अगर विजय मना करता तो फिर से विजय का बस मज़ाक ही बनता, न चाहते हुए भी उसने डरते-डरते ‘हाँ’ कर दी। जैसे ही ग्यारह बजे, दोनों ने टॉर्च और लालटेन उठाई और अपने गाँव के बाहर निकल पड़े। अब उसी सुनसान जंगल का कच्चा रास्ता शुरू हो गया था। पूरे जंगल में उनके पैरों के अलावा कोई और आवाज़ नहीं थी। जैसे-जैसे वे उस पेड़ के पास पहुँचते रहे, उतनी ही धुकधुकी बढ़ रही थी। जो थोड़ी-बहुत आवाज़ आ भी रही थी अब वह भी आना बंद हो गई थी। जैसे ही वे बरगद के पेड़ के पास पहुँचे, डर के मारे विजय की साँसें तेज़ होने लगीं।
क्योंकि वो पेड़ बहुत बड़ा और बहुत ऊँचा था और ऐसा लग रहा था जैसे कि वो पेड़ आसमान तक हो और उसकी मोटी-मोटी जड़ें दूर-दूर तक ज़मीन में फैली हुई थीं। तभी अरविंद ने लालटेन ज़मीन पर रख दी और बोला, “चल, हो जाए मुकाबला शुरू। अब देखते हैं कौन यहाँ पर कितनी देर तक रुक पाता है।” दोनों के दोनों उस पेड़ के सामने बैठ गए। उनके बैठते ही धीरे-धीरे हवा चलने लगी थी। विजय बार-बार डर के मारे इधर-उधर देखने में लगा हुआ था। अरविंद उसकी फिर मज़ाक बनाने लगा,

“देख, वो खड़ा तेरा भूत,” और अँधेरे में इशारे कर-कर के बार-बार डरा रहा था। लेकिन मज़ाक ही मज़ाक में विजय की आँखें चौंक गईं। उसे साफ़ दिखा कि उस पेड़ की शाखाओं में से एक शाखा हिली। विजय ने तुरंत अरविंद को बोला, “वो देख! तूने देखा उस शाखा को? वो हिली थी अभी।” अरविंद ने तुरंत टॉर्च से देखा तो वहाँ कुछ भी नहीं था। अरविंद उस पर चिल्लाया और बोला, “तेरा दिमाग़ तो सही है न? क्या फ़ालतू में कुछ भी बोलता रहता है!” तभी हवा थोड़ी तेज़ हुई और लालटेन बुझ गई। अब पूरे जंगल में बस अँधेरा ही अँधेरा था। उस अँधेरे में विजय की धड़कन डर के मारे तेज़ हो गई।
अचानक उस पेड़ में से लकड़ी चरमराने की आवाज़ आई, जैसे कोई उस पेड़ की शाखा को हिला रहा हो। दोनों ने जैसे ही डरते हुए ऊपर देखा तो अब सच में एक शाखा हिल रही थी और उस शाखा पर किसी की लाश भी लटक रही थी। लाश की गर्दन उन दोनों की तरफ़ को मुड़ी हुई थी और उन दोनों को घूर रही थी। जब अरविंद ने टॉर्च मारी तो उसकी सफ़ेद आँखें उस टॉर्च की रोशनी में चमक रही थीं। विजय वो आँखें देखते ही चीख़ते हुए पीछे हट गया। अब अरविंद जितना उसका मज़ाक बना रहा था, वह भी डरने लगा था। अरविंद ने अब डरते हुए बोला,

“ऐसे कैसे हो सकता है?” तभी उन दोनों को एक आवाज़ दी जो “दर्द हमने झेला है अब वो दर्द तुम भी झेलोगे।” दोनों वह आवाज़ सुनकर काँप गए, क्योंकि वो आवाज़ अब उस पेड़ पर से नहीं बल्कि ज़मीन में से आ रही थी। जैसे ही उन दोनों ने नीचे देखा तो ज़मीन में से कई भयानक हाथ बाहर आ रहे थे। विजय भागने को उठा, लेकिन अरविंद ने उसका हाथ पकड़ लिया। “नहीं! भागना मत, भागेगा तो फँस जाएगा।” उसी पेड़ की एक शाखा हिली और अरविंद के गले में आकर लिपट गई। वह ज़ोर-ज़ोर से चीख़ने लगा,
तभी शाखा ने अरविंद को ऊपर की तरफ़ खींचना शुरू कर दिया और अरविंद का शरीर धीरे-धीरे हवा में उड़ने लगा। विजय ने उसे बचाने की कोशिश की। विजय ने उस शाखा को पकड़कर खींचा, लेकिन शाखा बहुत ही ताकतवर और मोटी थी। पेड़ के ऊपर लटकी अरविंद की लाश की आँखें अब सफ़ेद हो गई थीं और कुछ ही पलों में उसका शरीर झूलने लगा। विजय उसे देखकर चीख़ता हुआ पीछे हट गया। उस पेड़ पर अब अरविंद के साथ-साथ और भी लाशें झूल रही थीं। और हर लाश की आँखें सफ़ेद चमक रही थीं और उन्हीं सफ़ेद आँखों से वे लाशें विजय को घूर रही थीं। वह तुरंत वहाँ से भाग निकला।

अब वो भागते-भागते अपने को बचाने के लिए जंगल में सुरक्षित जगह ढूँढ़ रहा था। भागते-भागते उसके कानों में हँसी और चीखों की आवाज़ आने लगी। जैसे ही उसने रुककर सामने देखा तो उसका दिल सामने का दृश्य देखकर थम गया। वह फिर से उसी जगह पहुँच गया था। वही बरगद का पेड़, वही शाखाएँ। वह काँपते हुए बोला,
“नहीं… ये कैसे… मैं तो भागकर दूर आ गया था…” फिर से वही जगह कैसे आ गई? अब उसी पेड़ पर सारी लाशें झूल रही थीं और उन सब में सबसे आगे अरविंद की लाश थी। उसकी वही सफ़ेद आँखें थीं और वह धीरे-धीरे अपने होंठ हिला रहा था, जैसे कुछ बोलना चाह रहा हो। फिर से विजय को एक और आवाज़ आई, “अब तेरी बारी है…” अचानक एक शाखा विजय की गर्दन में लिपट गई। विजय चीख़ते-चीख़ते अँधेरे में खो गया।
कहानी का निष्कर्ष (Conclusion)
इस प्रकार, अरविंद और विजय, अपनी-अपनी मान्यताओं (विश्वास और अंधविश्वास) के कारण, गाँव के सबसे डरावने रहस्य, ‘फाँसी वाला पेड़’ का शिकार बन गए। अरविंद का मज़ाकिया स्वभाव और विजय का डर दोनों ही उन्हें उस भयानक जगह तक ले गए, जहाँ से कोई वापस नहीं आता। कहानी यह दिखाती है कि कुछ चीज़ों को हल्के में लेना ख़तरनाक हो सकता है, और अंत में डर और रहस्य दोनों ने ही दोस्तों को निगल लिया। अब वे दोनों भी उस ‘फाँसी वाला पेड़’ के डरावने इतिहास का हिस्सा बन गए।
