The Shadow Trapped In The Mirror

नेहा और रोहन की शादी को करीब दो महीने ही हुए थे । शादी के बाद दोनों बहुत कुश थे और उनके कुश होने की वजह थी एक पुराना बंगला जो उन्होंने खरीदा था पर अपनी जगा से काफ़ी दूर।एक ख़ुशी का कारण यह भी था उन दोनों की ख़ुशी का की जो बंगला उन दोनों ने ख़रीदा था बहुत ही बड़ा था जिसका फर्श लकड़ी का था और साथ ही बहुत ऊची छत और एक सुंदर और अनोखा बगीचा था । वो बंगला ख़रीदने के बाद नेहा कुश हो कर रोहन को बोलती है ।कि कितना अच्छा कितने कम रेट पे कितना अच्छा अच्छा बंगला मिल गया

तभी रोहन बोला बोल तो तुम सही रही हो पर या बंगला कुछ जादा ही पुराना है तुम डर न्ही लग रहा इसे देख के, तभी नेहा बोली अरे नहीं नहीं मुझे डर क्यों लगता बल्कि मुझे तो पुरानी चीज बहुत पसंद है ।नेहा ने बोला अब हम दोनों बाहर ही बात करते रहे गए या अंदर भी चलेगे । उसके बाद दोनों अंदर चले गए, अंदर जाते ही नेहा ने सबसे पहले अपना कमरा ढूँड़ा जो पूरे बंगले मैं सब से जादा सुंदर था । वह एक पुरानी ड्रेसिंग्टेबल तो थी पर उसके ऊपर एक बड़ा शीशा लगा वा था , जिसमे हम अपने आप को पूरा देख सके तभी नेहा ने उस शीशा को छुवा और बोली रोहन यह तो बहुत ही सुंदर है ।

लेकिन वो सच मैं शीशा क्या है उन दोनों मैं से किसी को उसका अंदाजा न्ही था । क्यूंकि वही बड़ा शीशा उसकी ज़िन्दगी का सबसे डरवाना हिस्सा बनने वाला था । आज दोनों का पहला ही दें था उस बंगले मैं रोहन तो सो गया था लेकिन नेहा अपने उसकी ख़ूबसूरत कमरे मैं शीशे के सामने बैठ बैठ कर बाल बना रही थी । शीशे के सामने बैठे बैठे उसे कुछ ऐसा महसूस हुआ जैसे कि उसकी परछाईं हिली हो । उसने झटके से पीछे मुड़ के देखा तो कोई भी नहीं दिखा उसने सोचा शायद सुबह से भाग धोदी मैं थकने की वजहा से ऐसा लगा होगा , बस उस चीज को इग्नोर करके वह भी सोने चली गई ।

पर उसे यहाँ न्ही पता था ये सब तो शुरुवात है क्युकी जो उसने देखा था वो उसकी आखो खा धोका न्ही बल्कि वो सच था । अगली रात फिर से नेहा उसी शीशे के सामने बैठी फिर से उससे कुछ वैसे ही अहसास हुए इस बार उसने दिहान से देखा तो उसे ऐसा लगा जैसे कोई शीशे मैं मुस्कराह रहा हो जबकि उसके चहरे पे कोई मुस्कराहट ही न्ही थी यह देख के बार एक बार को वो डर गई । उसका दिल ज़ोर ज़ोर धड़कने लगा ,वो जल्दी से डरते डरते उस शीशे के सामने से उठी और रोहन के कमरे मैं जा के सो गई । उसके बाद कुछ दिन के लिए सब पहले जैसे ही नार्मल होगा ।

लेकिन जैसे ही तीन चार दिन बीते, तो नेहा हो सच मैं लगने लगा कि उसकी परछाई के साथ साथ कोई और भी है जो उसे देखता रहता है । अब कभी कभी नेहा को ऐसे लगने लगा था कि उसकी ही परछाई उसके पास आ रही है l लेकिन जैसे ही वो दिहान से शीशे मैं देखती उससे फिर कुछ नहीं दिखता । एक रात रोहन को सोते सोते नेहा की चिकने की आवाज आई तो रोहन घबराकर सोते सोते उठा उसने नेहा के कमरे मैं जा के देखा तो नेहा शीशे के सामने खड़े होके डर के मारे काप रही रही ।रोहन ने पूछा क्या हुआ नेहा तुम क्यों चिल्लाई थी ।

नेहा बोली मैं अभी अभी अपने आप को शीशे कि सामने पालक झपकते हुए देखा जबकि मैं पलक ही ननहीं हिलाई ।रोहन ने उससे पानी दिया और बोला तुम कुछ जधा ही इस शीशे के सामने बैठ कर कुछ सोच रही होगी इसलिए तुमे ऐसे लगा होगा , रोहन बोला चलो सोने चलते है नेहा ने खाली गर्दन हिलाई और उसके साथ सोने चलेगई लेकिन अंदर से नेहा को महसूस हो रहा था की वह पे कुछ तो था मुझे ऐसे धोका तो न्ही हो सकता । फिर से अगली रात जब नेहा अकेली थी तो उसने सोचा आज फिर देखती हूँ की वो सच था यह फिर मेरा भरम , नेहा फिर से उसी शीशे के पास जाके बेठ गई ।

नेहा ने फिर से डरते डरते शीशे मैं जका तो उसकी परछाई सच मैं ही मुस्कुरा रही थी और धीरा धीरा अपना हाथ बड़ा रही थी भार निकले के लिया यह सीन देखके नेहा की चीक निकले ही वाली थी की तभी वो परछाई धीरा से बोली मैं कोई और नहीं मैं नेहा ही हूँ नेहा को यह चीज देखते ही चकर आगा और नीचा ज़मीन पर गिर गई।पर जब कुछ टाइम के बाद उससे होश सा आया तो सब पहले जैसे ही नार्मल सा हो गया था । अब नेहा को लटते उठते बठते बस यही लगने था की कोई तो है उस पुराने शीशे के अंदर, एसे ही एक दिन की बात है रोहन ऑफिस गया वा था ,

नेहा ने सोचा की मुझे हिम्मत करनी पड़ेगी यह देखने की आख़िर वो क्या चीज है , नेहा ने हिम्मत करी और शीशे के सामने खड़ी होके डरते डरते बोली कोन हो तुम और मुझे क्यों परेशन कर रही हो । शीशे मैं उसकी परछाई फिर से दिखने लगी और वो मुस्करा रही थी और बोली की मैं ही असली नेहा हूँ । यह सुनते ही नेहा के तो हाथ पैर एक दम ठंडे पड़ गए, उसने चीक ने की भी कोशिश क्रि पर वो तो एक तहरा से पत्तर की तहरा जाम गई थी । अब उसके शरीरने बुलकुल ही कम करना बंद कर दिया था । नेहा की परछाई बोली की अब तुम्हारी नहीं बल्कि मेरी बारी है इतना बोला परछाई ने और तुरंत भार निकल आए शीशे मैं से ,

अपनी परछाई को एसे देख के नेहा की हालत अब बहुत बुरी होगी थी । सुबह होने पर जब रोहन घर लौटा, तो नेहा उससे बुलकुल पहले की तहर ठीक लगी , लेकिन नेहा नार्मल दिखने के बाद भी उसमे काफ़ी बदलाव दिख रहे थे जैसे उसकी आवाज का भारी हो जाना । उसका अलग तरीक़े से चलना और सबसे अजीब चीज यहाँ थी की वो जधातार उस बड़े पुराने शीशे कि सामने ही बैठी रहती थी । रोहन ने उसके एसे बदलाव देख के पूछा क्या तुम ठीक होना नेहा ने मुस्कराते हुए बोला हा हा मैं बुल्कुल ठीक हूँ बल्कि पहले से भी और भी अच्छा महसूस कर रही हूँ ।

लेकिन उसकी मुस्कान मैं कुछ अजीब था जिसे रोहन समझा चा रहता पर समज न्ही पा रहता की आख़िर नेहा को हुआ क्या है । ऐसे ही कुछ और दिन बीते एक दिन जब रोहन नेहा के रूम मैं गया तो उसने देखा की उसी बड़े शीशे पे कुछ उँगली से करोचने के जैसे निशान है । जैसे किसी चीज़ ने जबरदस्ती कुछ किया हो जैसे की उस शीशे से भार निकले का प्रियास , फिर एक रात रोहन की दुबारा आख खुली तो उसने नेहा के कमरे मैं आके देखा की नेहा शीशे के सामने खड़ी थी । लेकिन शीशे मैं नेहा नहीं दिख रही थी । वो दृश्य देख के रोहन के रोंगटे खड़े हो गए । ऐसे सीन देख के रोहन भी बहुत डर गया था फिर भी उसने हिम्मत करके पूछा नेहा तुम ठीक तो होना ।नेहा ने अपनी गर्दन रोहण की तरफ़ घुमाई और डरावनी आवाज मैं बोली अब मैं ही नेहा हूँ और अब मैं हमेशा यही रहूँगी,इतना बोलते ही वही डरावनी नेहा रोहन के पास आई और उससे भी गाला दबा के मार डाला ।
निष्कर्ष (Conclusion)
नेहा और रोहन एक तरफ़ तो पुराने बंगले को देख के कुश हो रहे थे, लेकिन नेहा के कमरे का पुरानी ड्रेसिंग टेबल का बड़ा शीशा जल्द ही उनकी खुशियों के लिए डरवाना खतरा बन जाता है। धीरे-धीरे नेहा को शीशे में अपनी परछाईं में अजीब बदलाव (मुस्कुराना, पलक झपकना) महसूस होते हैं। उसका डर तब सच साबित होता है जब शीशे में कैद उसकी ‘असली’ परछाईं उसे धमकाती है और खुद को असली नेहा बताती है। अंत में, शीशे से बाहर निकलकर वह डरावनी परछाईं नेहा का रूप ले लेती है और असली नेहा को पत्थर की तरह जमा देती है। जब रोहन घर लौटता है, तो वह बदल चुकी ‘नेहा’ को पहचान नहीं पाता। वह डरावनी नक़ली नेहा रोहन को भी गला दबाकर मार देती है, और इस तरह वह पुराना बंगला और उसका शीशा उनके नए जीवन के लिए घातक अंत बन जाते हैं।
